चार ट्रेडिंग सेशंस में 5.83 ट्रिलियन डॉलर का बाजार मूल्य उड़ गया। वजह? पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की नई टैरिफ घोषणाएं, जिन पर बाजार ने कड़ा रिएक्शन दिया। शुरुआती चोट वॉल स्ट्रीट के सबसे बड़े विजेताओं—टेक दिग्गजों—को लगी। एप्पल, माइक्रोसॉफ्ट, एनविडिया जैसे नामों में तेज गिरावट दिखी, क्योंकि ग्लोबल सप्लाई चेन पर लागत और अनिश्चितता दोनों अचानक बढ़ गईं।

मूड को और खराब किया नीति संकेतों की उलझन ने—कहीं जापान, कोरिया और भारत के साथ कुछ नरमी की बातें, तो दूसरी तरफ चीन को लेकर सख्ती। इसके बीच ट्रम्प की फेड चेयर जेरोम पॉवेल पर खुली आलोचना ने निवेशकों के मन में यह डर भी बैठा दिया कि कहीं मौद्रिक नीति पर राजनीतिक दबाव न बढ़ जाए।

क्या बदला: टैरिफ पैकेज के अहम बिंदु

टैरिफ फ्रंट पर कई कदम एक साथ आए। सबसे बड़ा बदलाव चीन से आने वाले माल पर—डि मिनिमिस छूट (जो छोटे पार्सल पर आम तौर पर शुल्क-मुक्ति देती है) को सीमित करते हुए अंतरराष्ट्रीय डाक नेटवर्क से आने वाले शिपमेंट पर भारी टैक्स का प्रावधान कर दिया गया। कार्यकारी आदेश के मुताबिक 14 मई 2025 से ऐसे पार्सल पर 54% ऐड वेलोरम या प्रति आइटम 100 डॉलर तक का शुल्क लगेगा। छोटे-छोटे ऑर्डर पर खरीदने वाले अमेरिकी उपभोक्ताओं और क्रॉस-बॉर्डर ई‑कॉमर्स सेलर्स के लिए यह बड़ा झटका है।

इसके साथ ही सेक्शन 232 के तहत स्टील और एल्युमिनियम टैरिफ की दरें बढ़ाने और कार्यकारी आदेश 14289 में संशोधन की घोषणा की गई। 3 जून 2025 की राष्ट्रपति घोषणा में फ्री‑ट्रेड जोन में दाखिल आयात पर नए नियम भी जोड़े गए। सेक्शन 232 राष्ट्रीय सुरक्षा के आधार पर औद्योगिक इनपुट पर शुल्क लगाने की अनुमति देता है—तो असर सिर्फ धातु कंपनियों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि ऑटो, कैपिटल गुड्स, कंस्ट्रक्शन उपकरण जैसी डाउनस्ट्रीम इंडस्ट्रीज़ की लागत भी चढ़ती है।

एक और सख्त संदेश उन वस्तुओं पर गया जो 25% वाले तथाकथित “फेंटानिल” टैरिफ दायरे में हैं—उन पर दरें और ऊपर ले जाने की धमकी दी गई। साथ में, चीनी मूल के उन माल पर जो अब तक डि मिनिमिस छूट के सहारे बिना शुल्क के आरे थे, कस्टम्स में सख्त जांच और शुल्क वसूली का स्पष्ट संकेत है।

ट्रेड कंप्लायंस रिसोर्स हब के टैरिफ ट्रैकर में इन कार्रवाइयों की टाइमलाइन दर्ज है—और यही संयुक्त असर बाजार में “नीति-जोखिम” प्रीमियम तेजी से बढ़ाने के लिए काफी रहा। जे.पी. मॉर्गन ग्लोबल रिसर्च के फाबियो बासी पहले ही चेतावनी दे चुके थे कि बदलते ट्रेड लैंडस्केप में इक्विटी बाज़ार सीमित दायरे में फंसे रह सकते हैं, लेकिन ताजा गिरावट ने विश्लेषकों की अपेक्षा भी पीछे छोड़ दी। चार्ल्स श्वाब की टीम महीनों से कह रही थी—टैरिफ का असर टलता है, टलकर आता नहीं; अब वही “डिलेयड इम्पैक्ट” तेज़ी से प्राइस‑इन हो रहा है।

डि मिनिमिस का एक व्यावहारिक असर समझिए: अमेरिका में 800 डॉलर तक के छोटे शिपमेंट पर आम तौर पर टैक्स नहीं लगता था। सस्ते गैजेट से लेकर फैशन आइटम तक, बड़ी संख्या में पैकेट इसी रास्ते आते थे। 54% या 100 डॉलर प्रति आइटम जैसी भारी दरें इन खरीदारियों का इकनॉमिक्स पलट देती हैं—या तो कीमतें ऊपर जाएंगी, या ऑर्डर का वॉल्यूम घटेगा, या दोनों।

सबसे बड़ा दर्द टेक में: बाजार और आगे क्या?

सबसे बड़ा दर्द टेक में: बाजार और आगे क्या?

टेक सेक्टर क्यों पस्त है, इसकी एक सीधी वजह है—इसकी सप्लाई चेन सबसे ग्लोबल है और चिप से लेकर केसिंग तक, कई अहम कंपोनेंट एशिया पर टिके हैं। सेमीकंडक्टर वैल्यू‑चेन में यदि एक भी कड़ी महंगी या धीमी होती है, तो पूरा प्रोडक्ट टाइमलाइन खिसकता है। एनविडिया जैसे डिज़ाइन‑हैवी नामों के लिए पैकेजिंग‑टेस्ट इकोसिस्टम में देरी और कॉस्ट‑अपसाइड सीधे मार्जिन पर बैठता है। एप्पल और माइक्रोसॉफ्ट जैसे प्लेटफॉर्म‑कंपनियों के हार्डवेयर पार्टनर भी अधिक इन्वेंट्री कैरी करेंगे, जिसका कैश‑फ्लो कॉस्ट है।

सेक्शन 232 का उछाल अलग लेयर जोड़ता है। स्टील‑एल्युमिनियम सस्ते नहीं होंगे, तो सर्वर रैक से लेकर नेटवर्किंग कैबिनेट और डाटा‑सेंटर इन्फ्रास्ट्रक्चर की लागत बढ़ेगी। क्लाउड प्रदाता—जो इस वक्त एआई कैपेक्स के सुपर‑साइकिल में हैं—अपने ऑर्डर के समय और साइज पर फिर से सोचेंगे। यह शेयरों के वैल्यूएशन मल्टीपल्स पर सीधा दबाव बनाता है।

निवेशकों का दूसरा डर नीति‑मिश्रण का है। अगर फेड को महंगाई के नए सोर्स (टैरिफ‑पुश्ड कीमतें) दिखते हैं, तो वह ज्यादा समय तक उच्च दरें बनाए रखने पर मजबूर हो सकता है। वहीं, जब राजनीतिक बयानबाजी फेड की स्वतंत्रता पर सवाल उठाती हुई दिखती है, तो बॉन्ड‑और‑डॉलर में “सेफ‑हेवन” चाल और इक्विटीज में डि‑रिस्किंग तेज हो जाती है।

बहुपक्षीय मोर्चे पर संकेत मिले‑जुले हैं। जापान, कोरिया और भारत के साथ कुछ डि‑एस्केलेशन की बातें आईं, पर चीन के साथ टकराव का टोन सख्त है। बीजिंग की ओर से रेस्पॉन्स—चाहे टैरिफ, रेगुलेटरी जांच या अनौपचारिक “नॉन‑टैरिफ” रुकावटें—यदि आता है, तो अमेरिकी टेक और कंज्यूमर ब्रांड्स के लिए एशिया की बिक्री और सोर्सिंग दोनों पर दबाव बनेगा।

किसे सबसे ज्यादा चोट लग रही है, एक नजर:

  • सेमीकंडक्टर वैल्यू‑चेन: EDA/IP लाइसेंसिंग, फाउंड्री बुकिंग, पैकेजिंग‑टेस्ट, सभी पर लागत और शेड्यूल जोखिम।
  • कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स: स्मार्टफोन, लैपटॉप, वेयरेबल्स—कंपोनेंट से लेकर EMS असेंबली तक कई नोड्स चीन/पूर्वी एशिया में हैं।
  • मेटल‑इंटेंसिव उद्योग: ऑटो, कैपिटल गुड्स, कंस्ट्रक्शन इक्विपमेंट—इनपुट महंगा, मार्जिन तंग।
  • क्रॉस‑बॉर्डर ई‑कॉमर्स: छोटे विक्रेता और मार्केटप्लेस जिन्हें डि मिनिमिस पर मॉडल बना था—अब उच्च शुल्क/कागजी अनुपालन।
  • लॉजिस्टिक्स और पार्सल: कस्टम क्लीयरेंस, HS‑कोड विवाद, निरीक्षण—टर्नअराउंड टाइम बढ़ने का रिस्क।

निवेशक आगे क्या देखें? तीन‑चार साफ संकेतक हैं।

  • यूएसटीआर और कस्टम्स की डीटेल्ड नोटिफिकेशन—कौन‑से HS कोड, किन अपवादों के साथ; यही बताएगा कि दर्द कहां केंद्रित रहेगा।
  • चीन की संभावित जवाबी कार्रवाई—क्वासी‑टैरिफ अड़चनें, डेटा/साइबर या रेयर‑अर्थ/मैटेरियल्स पर पॉलिसी सख्ती।
  • महंगाई और सप्लाई‑चेन डेटा—CPI के गुड्स बकेट, PPI, फ्रेट रेट्स, और PMI के ‘न्यू एक्सपोर्ट ऑर्डर्स’।
  • कॉर्पोरेट गाइडेंस—ग्रॉस मार्जिन, इन्वेंट्री डेज और कैपेक्स योजना में बदलाव के सिग्नल।

कंपनियां अपना प्लेबुक भी ऐक्टिव कर रही हैं—डुअल‑सोर्सिंग, “चाइना+1” (वियतनाम, भारत, मेक्सिको) की स्पीड बढ़ाना, और कुछ तिमाहियों के लिए इन्वेंट्री पुल‑फॉरवर्ड। पर यह सब रातोरात नहीं होता—कैपेसिटी शिफ्टिंग में क्वालिफिकेशन, क्वालिटी‑कंसिस्टेंसी और सप्लायर फाइनेंसिंग जैसे मुद्दे समय लेते हैं।

रिटेल साइड पर दिनचर्या बदलेगी। 20–50 डॉलर के गैजेट पर यदि 100 डॉलर तक की ड्यूटी का जोखिम है, तो कार्ट‑वैल्यू, ऑर्डर‑फ्रिक्वेंसी और चैनल सभी बदलेंगे। गलत वर्गीकरण/अंडर‑इनवॉइसिंग जैसे प्रलोभन भी बढ़ते हैं—लेकिन कस्टम्स का फोकस अब इन्हीं पर टिका रहेगा। नतीजा: ऑनलाइन खरीदारों के लिए डिलीवरी स्लो और कीमतें ऊपर जाने की संभावना।

भारतीय कोण भी दिलचस्प है। इलेक्ट्रॉनिक्स असेंबली में भारत पहले से प्लग‑इन हो रहा है; अगर अमेरिकी खरीदार चीन‑निर्भरता घटाते हैं, तो PLI जैसी नीतियां यहां नई लाइने ला सकती हैं। आईटी‑सेवाएं और चिप‑डिज़ाइन कैप्टिव्स अमेरिकी टेक बजट पर निर्भर हैं—कैपेक्स रीकैलिब्रेशन का असर आउटसोर्सिंग पाइपलाइन तक जा सकता है। रुपया‑डॉलर में हलचल भी बढ़ सकती है, क्योंकि ग्लोबल रिस्क‑ऑफ में उभरते बाजारों से फंड फ्लो अक्सर निकलते हैं।

आगे का रास्ता दो सीनारियो में बंटा दिखता है। एक—बातचीत में carve‑outs और अस्थायी छूटें निकलें, तो गिरावट स्थिर हो सकती है और कंपनियां नई कीमतों को धीरे‑धीरे पास‑थ्रू करेंगी। दूसरा—अगर टैरिफ एस्केलेशन जारी रहा और चीन ने सख्त कदम उठाए, तो अर्निंग‑कट्स, वैल्यूएशन‑कम्प्रेशन और कैश‑कंजरवेशन का चक्र लंबा चल सकता है। बाजार अभी इसी जोखिम को तेजी से प्राइस कर रहा है—और इस बार टेक सबसे आगे है, क्योंकि सप्लाई‑चेन का नक्शा उसी के हाथ में सबसे ज्यादा कांपता है।

Subhranshu Panda

मैं एक पेशेवर पत्रकार हूँ और मेरा मुख्य फोकस भारत की दैनिक समाचारों पर है। मुझे समाज और राजनीति से जुड़े विषयों पर लिखना बहुत पसंद है।